सरकार करें रैन बसेरा का इंतजाम तभी बचेगी गरीबों की जान
December 7, 2019 • Chanderpal

 सरकार करें रैन बसेरा का इंतजाम तभी बचेगी गरीबों की जान

डीएडी न्यूज निकिता ठगुन्ना। 
दिल्ली में लाखों  लोग घर के अभाव से गंदगी में जीवन बसर कर रहे हैं और सड़कों पर अपनी रात गुजारते  हैं । गर्मी के दिनों में  तो वह अपनी रात कहीं भी बिता लेते हैं किसी  जेसे फ्लाईओवर के नीचे, किसी पार्क में ,सड़क के किनारे व अन्य जगह पर लेकिन जब कड़ाके की सर्दी पड़ती हैं ऐसी स्थिति में उनके लिए रात गुजारना मुश्किल  हो जाता हैं तो उनके लिए दिल्ली सरकार और नगर निगम दोनों की और से  रेन बसेरा बनाए जाते हैं। रैन बसेरा बनाने का कार्य जब कड़ाके की सर्दी पड़ती है तब उस समय सरकार के द्वारा शुरु किया जाता है। जब प्यास लगे तब कुआं खोदने से प्यास नहीं बुझती इससे काफी लोग मर भी जाते हैं तो सरकार को जब प्यास लगे तब कुआ खोदने की जरूरत नहीं है  पहले से ही हर बार  सर्दी में सड़क के किनारे कई लोगों की मौत हो जाती है सर्दी के कारण तो ऐसी स्थिति में जब पहले से ही इसकी जानकारी हमें है व इस का पूर्वानुमान सरकार को है तो नेक काम में देरी  कैसी?साथ ही सरकार को उन जगहों में ज्यादा रैन बसेरा बनवाना चाहिए जहां झुग्गी बस्तियां है जैसे बस स्टॉप, रेलवे स्टेशन ऐसे आसपास की जगहों में रैन बसेरा कि सुविधा देकर लोगों को ऐसे आश्रय देने की जरूरत हैं। जिस कारण इससे ठंड में किसी की मौत ना हो सके। इस कार्य में सरकार लापरवाही बरतती है और जिस समय ठंड के कारण मौतें होने लगती हैं तो दिल्ली सरकार और दिल्ली नगर निगम एक दूसरे के गले को पकड़ने लग जाते हैं ऐसी स्थिति में   यह आफत शीत युद्ध का रूप लेती है जबकि दूसरी तरफ लोगों की मौते हो जाती है व लोग परेशान होने लगते हैं कि मैं अपना सर कहां पर छिपाऊं। इसकी तैयारी पहले से ही  हो जानी चाहिए और जगह-जगह रैन बसेरों का निर्माण व रैन बसेरा की सुविधा का कार्य अभी से ही शुरू किया जाना चाहिए क्योंकि अब कुछ महीनों बाद  ठंड बढ़ सकती हैं। सरकार को अभी भी इसका आगाज नहीं हो रहा तो अब चुल्लू भर पानी में डूबने की जरूरत हैं क्योंकि आमजन से उच्च कोटि तक के लोग रोड से ही अपनी राह की ओर जाते हैं जहां रोड के दोनों तरफ तमाम की तादाद पर बच्चे से बूढ़ों तक का चित्र नजर आता है और अगर सरकार यह कहकर चुप्पी साध लेती है कि रैन बसेरा की जगह उपलब्ध करा दी चुकी हैं तो यह रोड के किनारे  व पुल के नीचे  बैठे  और चल रहे  बच्चों में बूढ़ों का दृश्य  एक सफेद झूठ का सभी मत दाताओं के लिए जीता जागता उदाहरण हैं।