क्षय रोग तभी होता है जब किसी की प्रतिरोधात्मक क्षमता कम होती है
November 28, 2019 • Chanderpal

निकिता ठगुणा, नई दिल्ली 

नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ ट्यूबरक्लोसिस एंड रेस्पिरेटरी डिजीज के निदेशक डॉ रोहित सरीन का दावा है की  क्षय रोग को पूरी तरह से खत्म करने की दिशा में   हमारी  सरकार एवं चिकित्साजगत जिस शिद्दत  से  लगा है 2025 तक भारत क्षय रोग मुक्त होगा | क्षय रोग पूरी तरह ठीक होने वाली बीमारी है परन्तु जरुरी यह है की इसका पूर्ण उपचार समय पर किया जाये |  उन्होंने कहा की यह पूरी तरह से संक्रामक  है जो सांस के  द्वारा हमारे अंदर प्रवेश कर जाती है | उन्होंने बताया की स्वछता का ध्यान रखना भी जरुरी है | किसी को क्षय रोग तभी होता है जब किसी की प्रतिरोधात्मक क्षमता कम होती है | नब्बे प्रतिशत लोग इसका सामना कर लेते है | इसलिए जरुरी है की हम अपनी प्रतिरोधात्मक क्षमता को ठीक रखे | डॉ रोहित सरीन ने बताया कि तपेदिक एक संक्रामक बीमारी है जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में स्थानांतरित हो जाती है इसलिए खाते समय रुमाल का इस्तेमाल करें और अगर कोई बार-बार खास रहा है तो उस से खुद दूरी रखें ।अगर किसी को तपेदिक हो भी जाता है तो पैनिक होने की जरूरत नहीं है इसका इलाज आज के समय में पूरी तरह संभव है ।बस इसमें ध्यान यह  रखना होता है कि परिवार के अन्य सदस्य कम से कम आप के संपर्क में रहें  डॉक्टर द्वारा निर्धारित अवधि तक दवा का सेवन करें। दिल्ली और दिल्ली की संवादत्ता निकिता ठगुन्ना ने इस विषय पर उनसे बात की प्रस्तुत है बातचीत के मुख अंश -

 प्र:  वर्तमान में जो विभिन्न अस्पतालों के हालत है उसे आप कैसे देखते है ?
उत्तर:देखिये अस्पताल भिन्न भिन्न स्तर  के होते है कुछ अस्पताल तो भारत में बहुत अच्छे है जैसे की आपने  देखा  होगा आल इंडियन इंस्टीटुए ऑफ़ मेडिकल साइंस एक उच्च स्तरीय चिकित्सा संस्था है भारत सरकार ने ऐसी संस्थाओ के लिए काफी प्रयास किया है जहां एक विशेष बीमारी पर ही  फोकस किया जाता है जैसे हमारी यह संस्था जो एक विशेष रूप की बीमारी को ही देखती हैं जैसे फेफड़ो के रोगियों के लिए और जो फेफड़ो के रोगियों में जो मुख्य बीमारी मिलती है  वह है ट्यूबरक्लोसिस यानि क्षय रोग। इसके अलावा जब हम गावों में जाते है वहा  प्राइमरी हेल्थ सेंटर , डिस्पेंसरी है वहां  भी यह सुविधा उपलबध  है  हालाँकि वहां उच्च क्वालिटी की सुविधा उपलब्ध नहीं हैं लेकिन शहरों की बात करू तो मै  कह सकता हूँ की शहर में अत्याधुनिक तरीके से इस बीमारी की बेहतर चिकित्सा उपलब्ध  है। भारत सरकार ने इसके लिए काफी प्रयत्न किया है  इसका इलाज भी मुफ्त है  और गावों -गावों में भी इसका इलाज उपलब्ध है और इसकी जाँच के लिए  भी आधुनिक मशीने  प्रत्येक  जिला छेत्र  में उपलब्ध हैं।

प्र: सफाई के प्रति जो जागरूकता होनी चाहिए उसे कैसे बढ़ाया जा सकता हैं?
उ०: यह एक अभियान हैं जैसे हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी ने  स्वच्छता भारत अभियान शुरू किया हैं ऐसे ही हमें भी बताते हुए खुशी होती है की हमें भी सफाई के प्रति दो बार अवार्ड मिले हैं और यहां के सभी वार्ड  मैं आए मरीजों के परिवारजनों ने देखा होगा कि हम विशेष रुप से यह ध्यान रखते हैं कि सफाई हर वक्त बनी रहे ।सबसे ज्यादा मरीजों व उसके परिवार जनों में जागरूकता की आवश्यकता रहती है क्योंकि यहां अलग-अलग क्षेत्रों से लोग आते हैं वह दो हफ़्तों तक कम से कम यहां रहते है तो वह उस पर निर्भर करता है जब वह यहां रहेंगे तो यह उनके व्यवहार पर निर्भर करता है कि उन्हें वातावरण स्वच्छ रखना हैं या गंदा। अस्पताल रोगियों की चिकित्सा तो देता ही है साथ ही सफाई के लिए भी समय-समय पर सचेत करते रहते हैं ताकि उनके परिवारजनों में कोई भी इस तपेदिक रोग से ग्रस्त ना हो सके।

प्र ० तपेदिक का क्या कारण मानते हैं इसमें क्या ऐतिहात बरतना चाहिएं?
उ० तपेदिक एक कीटाणु है जिसको माइकोबैक्टेरियम ट्यूबरक्लोसिस कहते हैं जो हवा द्वारा  हमारे फेफड़ों में आता है जो किसी व्यक्ति द्वारा फैलता है यानी एक मरीज से दूसरे मरीज द्वारा यह  होता है जो फिर  उस व्यक्ति पर निर्भर करता है कि उसकी प्रतिरोधक क्षमता कितनी मजबूत है क्योंकि यह क्षमता हमें रोगों से लड़ने की ऊर्जा देती हैं जिसकी  प्रतिरोधक क्षमता अच्छी होती है  ऐसे   90% लोगों को   यह बीमारी नहीं होती परंतु ऐसा देखा जाता है जिनकी प्रतिरोधात्मक क्षमता कम होती हैं जो  एचआईवी और एड्स , धूम्रपान व ड्रग्स के आदि से ग्रस्त  होते है उनको यह बीमारी आसानी से लग जाती।  

प्र ० तपेदिक के मरीजों के लिए कोई परहेज भी  हैं या फिर दवा ही काफी हैं?
उ० परहेज केवल खानपान का ही होता है जैसे हम कहते हैं अगर आप इलाज ले रहे हैं तो  शराब का सेवन नहीं करना हैं क्योंकि वह दवाई के साथ इंटरेक्शन करती है और लीवर को  भी खराब कर देता हैं और हम सिगरेट और तंबाकू का सेवन करने से भी   मना करते हैं क्योंकि वह पूरे सिस्टम को कमज़ोर  कर देता हैं और टीवी होने की संभावना बढ़ जाती हैं तंबाकू का मूल प्रभाव फेफड़े  पर  पड़ता हैं  जैसे खासी बढ़ना सांस फूलना शुरू हो जाता है खानपान में विशेष पोषक तत्व निरंतर लेनी चाहिएं। इसके लिए मैं आपको सूचित करना चाहता हूं कि भारत सरकार टीवी के मरीजों के लिए प्रति माह 500 रुपए देती है।

प्र० क्या भारत में तपेदिक के दरों में कमी आई हैं?
उत्तर  विश्व में तपेदिक को मापने का एक पैमाना तय किया गया हैं  जिससे इसके दरों को  मापा जाता हैं इसमें उत्तरोत्तर सुधर हो रहा है इस दिशा में भारत भी तेजी से आगे बढ़  रहा  है  भारत ने एक समय -सीमा तय की है जिसके तहत 2025 तक भारत को तपेदिक मुक्त बनाने की योजना है हालाँकि विश्व स्तर पर तपेदिक को खत्म  करने का अंत 2030 निर्धारित किया गया है।भारत अपने लक्ष्यप्राप्ति की दिशा में  तेजी से आगे बढ़ रहा है.
 
प्र:  तपेदिक के  लक्षण को कैसे पहचाना जा सकता है?
उत्तर: तपेदिक फेफड़ों से संबंधित बीमारी हैं तो लक्षण फेफड़ों से ताल्लुक रखते हैं जैसे मरीज को खांसी आना, बलगम आना। यह लंबे अरसे तक चलती है  2 से 4 हफ्ते से अधिक अगर खासी हो तो तपेदिक के लक्षण के रूप में इसे  देखा जा सकता  हैं  । इसके साथ शरीर के अंदर कुछ अन्य  लक्षण भी आते हैं जो इस संक्रमण में देखे जाते हैं जैसे बुखार आना, भूख ना लगना , वजन कम होना बलगम में खून आना।  इस  टीवी के लक्षण के बाद  हमें टीवी की जांच करानी चाहिए। जिसके लिए हमारे अस्पताल में इसकी चिकित्सा के लिए  जांच की सुविधा है और अब बलगम में मॉलिक्यूल डायग्नोस्टिक आए है जिनके आधार पर हम पता लगा लेते हैं कि टीवी है या नहीं साथ ही  जो कीटाणु टीवी का है वह सामान्य दवाई से ठीक होगा या नहीं या इसके लिए विशेष दवाई की आवश्यकता है इसको चिकित्सक भाषा में ड्रग सेंसटिविटी कहते हैं हमारे पास तकनीक भी है  और सरकार भी।

प्रश्न  : क्या एडवांस स्टेज में भी तपेदिक का इलाज संभव  है?  
उत्तर   तपेदिक  में एक बात आती है जिसे चिकित्सक भाषा में ड्रग रेजिस्टेंस टीवी कहते है उसमें यह होता है कि मरीज ने या तो ढंग से दवाई नहीं खाई हो या उसे डॉक्टर ने ढंग से दवाई नहीं दी हो। जैसे कि हमारे यहां इसको जांचने के लिए जांच मशीन उपलब्ध है उससे  हम पता लगा लेते हैं और इसके लिए भी हमारे पास दवा उपलब्ध है और अगर मरीज उन दवाइयों को ढंग से लेता है तो मरीज 80% ठीक होने की संभावना रखता है अगर फिर भी मरीज उन दवाइयों को ढंग से नहीं लेता है तो रजिस्टेंस आ जाते हैं फिर ऐसी स्थिति में यह  ना-इलाज हो जाता है।

प्रश्न: डॉक्टर के लिहाज से आप क्या संदेश देना चाहेंगे ?
उत्तर: मेरा संदेश सभी को यही होगा कि अगर टीवी है तो जांच कराइए ,डॉक्टर की सलाह मानिए दवाइयों को समय से लीजिए सरकार भी हमारे साथ है। अगर ड्रग रेजिस्टेंस आता भी हैं तो उसका भी हमारे पास इलाज है । मुझे विश्वास है कि अगर आप सब हमारे साथ होंगे तो निश्चय ही हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर इससे मुक्ति पा सकते हैं।