द फ्यूचर न्यूज़रूम’ पुस्तक का विश्व पुस्तक मेले में विमोचन
January 13, 2020 • Chanderpal

 

 डीएडी न्यूज़ नई दिल्ली 

प्रौद्योगिकी ने मीडिया के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए जहाँ गंभीर चुनौतियाँ पेश की हैं, वहीँ काम को आसान भी बनाया है और पत्रकारों के लिए काम और अभिव्यक्ति के नए द्वार खोले हैं. भविष्य के समाचार कक्ष पर केन्द्रित पुस्तक ‘द फ्यूचर न्यूज़रूम’ के विश्व पुस्तक मेला-2020 में शुक्रवार को विमोचन के अवसर पर चर्चा में कहा गया कि विश्व में संवाद प्रेषण की शुरुआत पत्थर की शिलाओं पर राजाज्ञाओं को जारी करने से लेकर आज ‘मोजो’ यानि ‘मोबाइल जर्नलिज्म’ के दौर में आ गयी है. वरिष्ठ पत्रकार और ‘ओर्गनाइज़र वीकली’ के प्रमुख समाचार समन्वयक डॉ प्रमोद कुमार की इस पुस्तक का विमोचन करते हुए भारतीय जनसंचार संस्थान नई दिल्ली के पूर्व महानिदेशक प्रो. के. जी. सुरेश ने कहा कि “यह पुस्तक भविष्य में पत्रकारिता की प्रोद्योगिकी और मीडिया का झरोखा है.” उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीक ने मीडियाकर्मियों के लिए कार्यस्थल की चुनौतियां पैदा की हैं और रोजगार पर दबाव डाला है, लेकिन यूट्यूब और ब्लॉग आदि के माध्यम से बहुत से मीडियाकर्मियों ने अपने लिए नए अवसर भी सृजित किए हैं. उन्होंने कहा कि हम पत्रकारिता की तकनीक में हो रहे बदलाव की तरफ से आँख नहीं मूँद सकते और सजग मनुष्य चुनौतियों को अवसर में बदलने की क्षमता रखता है.पुस्तक का प्रकाशन दिल्ली के ‘किताबवाले’ प्रकाशन समूह द्वारा किया गया है. 456 प्रष्ठ की यह पुस्तक अंग्रेजी में है. परिचर्चा में लोक सभा टीवी के संपादक एवं कार्यकारी अधिकारी डॉ. आशीष जोशी ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का विस्तार से उल्लेख करते हुए कहा कि पत्रकारों को समय के साथ बदलना होगा और यह पुस्तक आँख खोलने वाली है और हमें पत्रकारिता के अतीत का परिचय कराते हुए इसके भविष्य की चुनौतियों और संभावनाओं का दिग्दर्शन कराती है. उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि पत्रकारिता में अनुसन्धान पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए ताकि भविष्य की चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया जा सके.नेशनल बुक ट्रस्ट के निदेशक युवराज मलिक ने कहा कि अब तक हम इस बात की चर्चा करते रहे हैं कि मानव जीवन में तकनीक की क्या भूमिका है, परन्तु अब ‘आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस’ का दौर है और अब बहस यह छिड़ेगी कि तकनीकी के दुनिया में मनुष्य की भूमिका क्या है. परन्तु उन्होंने कहा कि तकनीक के कारण मीडिया में क्रन्तिकारी बदलाव आये हैं लेकिन यदि यह परिवर्तन विकास क्रम से आये तो वह पीड़ादायक नहीं होगा. उन्होंने कहा कि जिस गति से न्यूज़रूम में बदलाव हो रहे हैं उस गति से हमें उसके साथ संयोजन बैठाने की जरूरत है.दिल्ली पत्रकार संघ के अध्यक्ष एवं पीटीआई-भाषा के वरिष्ठ पत्रकार  मनोहर सिंह ने कहा कि न्यूज़रूम में नई तकनीक के कारण जो तनाव बढ़ रहा है उससे पत्रकारों का पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है. उन्हें ट्विटर और फेसबुक से होड़ करनी पड़ रही है. न्यूज़रूम के तनाव को कम करने पर मीडिया संस्थानों, सरकार, पत्रकार संगठनों और पत्रकारों को ध्यान देने की जरूरत है. 
वरिष्ठ पत्रकार और आकाशवाणी समाचार में परामर्शदाता   उमेश चतुर्वेदी ने रुबर्ट मुर्डोक के कथन का हवाला देते हुए कहा कि तकनीक मीडिया के लिए चुनौती अवश्य है परन्तु अख़बार स्वयं को पाठकों की आवश्यकता को संतुष्ट करते हुए और बदलती तकनीक के अनुसार स्वयं को ढाल कर मीडिया क्षेत्र में नए आयाम खोल सकते हैं. उन्होंने कहा कि स्थिति चिंताजनक जरूर है, परन्तु निराशाजनक नहीं हैं क्योंकि मानव मस्तिष्क ही चुनौतियों का समाधान करता है.इस अवसर पर गाँधी स्मृति एवं दर्शन समिति द्वारा प्रकाशित डॉ प्रमोद कुमार की दो अन्य पुस्तकों, ‘आधुनिक भारत कगुमनाम समाज-शिल्पी’ एवं ‘अनसंग बिल्डर्स ऑफ़ मॉडर्न भारत’ का भी विमोचन किया गया.‘किताबवाले’ प्रकाशन समूह के अध्यक्ष श्री प्रशांत जैन ने कहा कि वे आज प्रकाशित पुस्तक  ‘द फ्यूचर न्यूज़रूम’ का जल्दी ही पेपरबैक संस्करण भी जारी करेंगे और इसका हिंदी भाषा में भी अनुवाद प्रकाशित करेंगे. इस अवसर पर गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. अंजिला गुप्ता, पूर्णिया विश्वविद्यालय बिहार के कुलपति प्रो. राजेश सिंह, दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज की प्रधानाचार्या डॉ विभा सिंह चौहान, आकाशवाणी के अतिरिक्त महानिदेशक श्री राजशेखर व्यास, हिन्दुस्थान समाचार न्यूज़ एजेंसी के कार्यकारी संपादक श्री जितेन्द्र तिवारी, सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ अमित राय जैन तथा शिक्षा जगत एवं मीडिया से सैंकड़ों लोग उपस्थित  थे. पुस्तक का परिचय देते हुए लेखक डॉ प्रमोद कुमार ने कहा कि पुस्तक भारतीय मीडिया के न्यूज़रूम में आज तक हुए सभी तकनीकी विकास से ही अवगत नहीं कराती, बल्कि भविष्य का न्यूज़रूम कैसा होगा इसका भी एक खाका हमारे सामने प्रस्तुत करती है. चूँकि पुस्तक उनके पांच वर्षों के शोध पर आधारित हैं इसलिए पुस्तक में प्रस्तुत जानकारी पूरी तरह तथ्यात्मक है. पुस्तक न्यूज़रूम में उभर रही अनेक प्रकार की चुनौतियों से भी रूबरू कराती है. ऐसी ही चुनौती है न्यूज़रूम में काम करने वाले लोगों में बढ़ता तनाव. न्यूज़रूम में काम करने वाले 84 प्रतिशत लोगों ने माना है कि वे भारी तनाव में काम कर रहे हैं. इसके अलावा 93 प्रतिशत लोगों का कहना है कि तनाव और काम के अत्यधिक दबाव के कारण उत्पन्न विभिन्न बीमारियों के शिकार हैं. 79 प्रतिशत को उन बीमारियों के इलाज हेतु दवाइयां लेनी पड़ती हैं. 94 प्रतिशत लोगों का कहना है कि लम्बे समय तक कंप्यूटर स्क्रीन पर काम करने के कारण उन्हें आंखों में तकलीफ हैं. 83 प्रतिशत लोगों का कहना है ऑफिस में काम के दबाव के कारण उनके पास अपने बीमार परिवारजनों को डॉक्टर के पास ले जाने का भी समय नहीं होता. 82 प्रतिशत का कहना है कि उनके पास स्वयं के इलाज हेतु भी डॉक्टर के पास जाने का समय नहीं होता. 91 प्रतिशत का कहना है कि यदि उनके तनाव को कम करने का प्रबंध किया जाये तो वे बेहतर ‘क्रिएटिविटी’ से काम कर सकेंगे. पुस्तक में बताया गया है कि जो लोग तकनीक के साथ नहीं चलेंगे उनका पिछड़ना तय है और जो लोग  बदलती तकनीक को अपना दोस्त बनाकर चलेंगे वे लम्बी पारी खेलेंगे. डॉ प्रमोद कुमार ने विस्तार से बताया कि किस प्रकार सम्राट अशोक के कार्यकाल में  करीब 2250 साल पूर्व पत्थर पर सूचनाओं की खुदाई की जाती थी और किस प्रकार रोमन साम्राज्य में 59 बीसी में पत्थर पर खबरों कि खुदाई करके उन पत्थरों को चौराहे पर टांगा जाता था. इसके आलावा कागज, आधुनिक प्रिंटिंग प्रेस, टेलीग्राफ, टेलीफोन, टेलेक्स, रेडियो, टीवी, उपग्रह, कंप्यूटर, इन्टरनेट, मोबाइल फ़ोन और स्मार्टफ़ोन के अविष्कार के कारण समाचार के संकलन और प्रसार में किस प्रकार बदलाव आया है वह भी विस्तार से बताया गया है. लैटर प्रेस के बाद हॉट मेटल टाइपसेटिंग में मोनोटाइप और लाइनोटाइप तथा फोटोटाइपसेटिंग के बारे में भी जानकारी हैं. अब किस प्रकार इन्टरनेट और स्मार्टफ़ोन ने न्यूज़रूम का परिद्रश्य बदल दिया है इसकी भी जानकारी है. अपने इस अध्ययन के दौरान डॉ प्रमोद ने देश के छह बड़े मीडिया हाउस के न्यूज़रूम यानि टाइम्स ऑफ़ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, आज तक और टाइम्स नाउ के न्यूज़रूम का अध्ययन किया है.